केवल ज्ञान सुनना ही नहीं बल्कि इसे अमल करना भी जरुरी होता है

पढाई के साथ साथ उसे अपने हाथों से करने से ही हमें असली ज्ञान मिलता है। 

ध्यानचंद के विशाल महल में एक सुंदर बगीचा था जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। प्रतिदिन एक चिड़िया आकर उनमें से मीठे अंगूरों को चुन-चुन कर खा जाती थी। और कच्चे और खट्टे अंगूरों को गिरा देता था। माली ने पक्षी को पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन वह हाथ नहीं आ सकी। आखिर में हार मान कर उस माली ने ध्यानचंद को यह बात बताई। यह सुनकर भानुप्रताप को बड़ी हैरानी हुई। उसने भी चिड़िया को सबक सिखाने का फैसला किया और सबक सीखने के लिए बगीचे में कहीं छिप गया।

जब चिड़िया अंगूर खाने के लिए वह पर आई, तो ध्यानचंद ने बड़ी ही रफ़्तार से भाग कर उस चिड़िया को पकड़ लिया। जब ध्यानचंद ने पक्षी को मारना शुरू किया, तो चिड़िया ने कहा, "मुझे मत मारो।" मैं आपको इसके बदले में मैं तुम्हे 4 महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी। 'ध्यानचंद ने कहा,' जल्दी बताओ।' चिड़िया ने कहा, "हे राजन, सबसे पहली महत्वपूर्ण बात, कभी भी दुश्मन को हाथों से मत छोड़ो।" ध्यानचंद ने कहा, 'अब दूसरी बात बात बताओ।'

चिड़िया ने कहा, "कोई बात जो असंभव हो उस पर भूलकर भी कभी भरोसा मत करो, और तीसरी बात जो बात बीत चुकी है उसका कभी पश्चाताप मत करो।" ध्यानचंद ने कहा, 'अब चौथी बात भी जल्दी बताओ।' इस पर चिड़िया ने कहा, 'चौथी बात बहुत गहरी और रहस्यमयी है। मुझे थोड़ा ढीला छोड़ दो क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। कुछ साँस लेकर बताउंगी। पर जैसे ही ध्यानचंद ने अपना हाथ ढीला किया, चिड़िया उसके हाथों से निकल कर उड़ गई और एक शाखा पर जा बैठ गई और बोली, 'मेरे पेट में दो हीरे हैं।'

यह सुनकर ध्यानचंद को बड़ा पश्चाताप हुआ। राजा की ऐसी हालत देखकर, चिड़िया ने कहा, ज्ञान सुनने और पढ़ने में कोई फायदा नहीं होता राजन, बल्कि उसका पालन भी किया जाता है। आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी एक दुश्मन थी, फिर भी आपने मुझ पर भरोसा किया और मुझे छोड़ दिया। मैंने एक असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं, आपने उस पर भी भरोसा कर लिया। आपके हाथ में वे काल्पनिक हीरे नहीं आए, तो आप को पछतावा हो रहा है।