बुरी संगत को छोड़ कर आगे की सोचें

अपनी गलती का अहसास करें और अच्छे काम के लिए आगे बढें। 

रामगढ़ गाँव में एक शिक्षक रहते थे जो बहुत स्नेही और उच्च आदर्शवादी थे। वह स्कूल के बच्चों को बड़े प्यार और लगन के साथ पढ़ाते थे। उनका खुद का बेटा महेश भी उसी स्कूल में पढ़ता था। महेश मास्टरजी का एकमात्र पुत्र था, इसलिए मास्टर जी उसकी बहुत देखभाल करते थे और मजाक में कहा करते थे कि वह उनकी आँखों का तारा है। समय बीतता गया और महेश 12 साल का हो गया।

अब तक वह आठवीं कक्षा में पहुँच चुका था और मन लगा कर पढाई करता था। उसकी समझ को देखकर, माता-पिता निश्चित हो गए और उस पर ध्यान थोड़ा कम दिया जा सकता है। महेश अब आज़ादी पाकर खुश था लेकिन इस स्वतंत्रता ने उसे बुरी संगति की ओर पहुंचा दिया। इसका असर जल्द ही उस पर दिखने लगा। अब वह रात भर आवारा लड़कों के साथ घूमने लगा, माता-पिता से भी खूब झगड़ा किया करता था।

एक दिन मास्टरजी महेश को अपने साथ वहाँ से बाज़ार ले गए, उन्होंने सेब की एक टोकरी खरीदी और घर लौट आए। महेश ने टोकरी में एक सेब देखा जो काफी गला हुआ था। महेश ने उसे फेंकना चाहा और उसे बाहर फेंक दिया क्योंकि उसे बहुत बुरी गंध आ रही थी लेकिन मास्टरजी ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। अगले दिन, मास्टरजी ने महेश से पूछा, बेटा, खाने के लिए सेब की टोकरी में से कुछ सेब लाओ।

पिता की बात सुन कर जब महेश टोकरी में से सेब लेने गया। महेश ने जैसे ही टोकरी खोली तो टोकरी में सेब को देख कर वह दंग रह गया क्योंकि टोकरी में सभी सेब सड़े हुए थे और उनमें से बदबू आ रही थी। मास्टर जी पहले से ही इसकी आशंका जता रहे थे, इसलिए वे महेश के पास गए और उनसे कहा कि बेटा, देखो कैसे सड़े हुए सेब ने अन्य सेबों को खराब कर दिया। पिता की बातें सुनकर महेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। और उसी के बाद महेश ने अपने बुरे दोस्त छोड़ दिए।